
। श्रीमद्भगवद्गीता ।।
( Manual Of Mind )
भगवद्गीता में सुख-दुःख का विवेचन
हम सभी ‘सुख’ चाहते हैं ताकि हम सुखी रह सकें। कोई भी व्यक्ति दुःखी रहना नहीं चाहता तथापि ‘दुःख’ हमारा पिंड ( साथ ) नहीं छोड़ता।.
— श्रीमद्भगवद्गीता .
भगवद्गीता में सर्वप्रथम ‘सुख’ शब्द का उल्लेख अर्जुन ने किया है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अपने सारथी श्री कृष्ण को अर्जुन कहता है कि मुझे सुख की आकांक्षा नहीं है। अर्जुन तो यहां तक कह जाता है –
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
अर्थात् हे श्रीकृष्ण ! मैं न तो विजय चाहता हूं, न राज्य और न ही सुखों को चाहता हूं।
यहां यह समझने वाली बात है कि यदि विजय, राज्य एवं सुख की आकांक्षा अर्जुन को नहीं थी, तो उसे पांडवों सहित पुनः 12 वर्षों के वनवास पर मृगछाला पहनकर गमन कर जाना चाहिए था। लेकिन वह तो सात अक्षौहिणी सेना लेकर कुरुक्षेत्र के मैदान में संघर्ष करने के लिए डटा हुआ है। किसलिए ? विजय, राज्य एवं सुख के लिए ही।
अर्जुन के कथनी और करनी में काफी अंतर दिख रहा है। वास्तव में अर्जुन के भीतर सुख की आकांक्षा / कामना है। अर्जुन का बचपन एवं तारुण्य जीवन राजमहल के प्रांगण में ही बीता है। सुख का भोग अर्जुन कर चुका है। अरण्य / जंगल में रहकर अथवा किसी आश्रम में रहकर सुख नहीं पाया जा सकता – यह अर्जुन की मान्यता है।
सुख सशर्त है। सुख तभी होगा, जब अपना राज्य होगा। राज्य भी सशर्त है। युद्ध में जब विजय मिलेगी, तभी राज्य प्राप्त होगा। विजय, राज्य एवं सुख – तीनों सशर्त हैं तथा सभी एक दूसरे पर आश्रित हैं।

इसके बाद तो अर्जुन और भी अद्भुत बात कह देता है –
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव।।
अर्थात् – हे माधव ! अपने ही स्वजनों को मार कर हम कैसे सुखी होंगे ?
यह सुनकर हम सभी को बड़ा आश्चर्य लग रहा होगा कि स्वजनों अर्थात् धृतराष्ट्र पक्ष के सैनिकों की हत्या से अर्जुन के सुखी होने का क्या संबंध है ?
इसका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्र पक्ष जीवित रहे, तभी अर्जुन सुखी रहेगा। और हम सभी यह जानते हैं कि दुर्योधन सहित धृतराष्ट्र-पक्ष के लोग तो जीवितावस्था में ही हस्तिनापुर के राजमहल में सुख भोग रहे हैं, केवल अर्जुन सहित पांडव-पक्ष सुख नहीं दुःख भोग रहा है।
दुर्योधन तो सूई के अग्रभाग के बराबर भी भूमि पांडव पक्ष को देना नहीं चाहता। इसीलिए तो संघर्ष की नौबत आई है।
शोकाकुल अर्जुन एकदम उल्टी बात कह रहा है। विषाद की अवस्था में अर्जुन इसका कारण भी बताता है कि राज्य और सुख के लोभ में हम सभी स्वजनों की हत्या करने के लिए उद्यत हो गए हैं।
इसका तात्पर्य यह है कि यदि हम सुख नहीं चाहें, तो हमें मारने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। तब तो अर्जुन को युद्ध करने के लिए कुरुक्षेत्र में संग्राम के लिए आना ही नहीं चाहिए था और आने के पश्चात् जब वह यह वक्तव्य वह दे रहा है, तब वक्तव्य देने के पश्चात तो उसे युद्ध भूमि छोड़ देनी चाहिए थी। लेकिन अर्जुन ऐसा भी नहीं कर रहा है।
तब भगवान श्री कृष्ण को सुख के साथ दुःख पर भी अपने विचार प्रकट करने पड़े अन्यथा युद्धक्षेत्र में सुख पर वक्तव्य रखने का कोई औचित्य ही नहीं था।